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भारत के लोक नृत्य: राज्य-वार संपूर्ण सूची, प्रमुख विशेषताएँ एवं परीक्षा उपयोगी नोट्स

UPSC, SSC एवं राज्य PCS परीक्षाओं के लिए भारत के प्रमुख लोक नृत्यों की राज्य-वार सूची, यूनेस्को धरोहर स्थिति, याद रखने की ट्रिक्स और पिछले वर्षों के परीक्षा पैटर्न का संपूर्ण विश्लेषण।

⭐ मुख्य बिंदु

  • लोक नृत्य बिना किसी औपचारिक शास्त्रीय व्याकरण के सामूहिक उल्लास, मौसमी चक्र और सामाजिक रीति-रिवाजों से विकसित होते हैं।
  • गुजरात के ‘गरबा’ को दिसंबर 2023 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (ICH) सूची में भारत के 15वें तत्व के रूप में शामिल किया गया।
  • राजस्थान का ‘कालबेलिया’ और पूर्वी भारत का ‘छऊ’ नृत्य वर्ष 2010 से यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं।
  • मिजोरम का ‘चेराव’ नृत्य अपने तालबद्ध बांस-कौशल के लिए प्रसिद्ध है, जिसे बांस नृत्य (Bamboo Dance) भी कहा जाता है।
  • उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र का ‘चरकुला’ नृत्य सिर पर 108 दीपकों का पिंजरा संतुलित करके किया जाता है।
  • छऊ नृत्य की तीन शैलियाँ हैं—सरायकेला (झारखंड), पुरुलिया (पश्चिम बंगाल), और मयूरभंज (ओडिशा); जिनमें से केवल मयूरभंज में मुखौटा नहीं पहना जाता।
  • मेघालय का गारो समुदाय फसल उत्सव पर ‘वांगला’ नृत्य करता है, जिसे ‘हंड्रेड ड्रम्स फेस्टिवल’ (100 ढोलों का नृत्य) कहा जाता है।

भारत के लोक नृत्य: सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एवं संकल्पना

भारत की सांस्कृतिक विविधता की सबसे जीवंत अभिव्यक्ति यहाँ के लोक नृत्यों (Folk Dances) में देखने को मिलती है। शास्त्रीय नृत्यों (Classical Dances) के विपरीत, जो नाट्यशास्त्र और अभिनय दर्पण जैसे प्राचीन ग्रंथों के कड़े व्याकरण और नियमों से संचालित होते हैं, लोक नृत्य आम जनमानस की सहज अनुभूतियों, कृषि चक्रों, मौसमी बदलावों, धार्मिक अनुष्ठानों और जनजातीय परंपराओं से स्वतः प्रस्फुटित होते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे UPSC, BPSC, SSC CGL तथा रेलवे में कला एवं संस्कृति खंड के तहत लोक नृत्यों, उनसे जुड़ी जनजातियों, प्रयुक्त वाद्ययंत्रों और हालिया यूनेस्को मान्यताओं पर बहुतायत में प्रश्न पूछे जाते हैं।

शास्त्रीय नृत्य बनाम लोक नृत्य: मुख्य अंतर

परीक्षा में अक्सर शास्त्रीय और लोक नृत्य की बुनियादी भिन्नता पर प्रश्न बनते हैं:

  • नियम एवं व्याकरण: शास्त्रीय नृत्यों में हस्तमुद्राओं, पाद-संचालन और रस-सिद्धांत के निश्चित शास्त्रसम्मत नियम होते हैं (जिन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा 8 प्रमुख शैलियों में मान्यता दी गई है)। इसके विपरीत, लोक नृत्यों में कोई लिखित शास्त्र नहीं होता; यह मौखिक और व्यवहारिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं।
  • प्रदर्शन का उद्देश्य: शास्त्रीय नृत्य मूल रूप से मंदिरों और दरबारों में मोक्ष, भक्ति और परिष्कृत कला प्रदर्शन के लिए विकसित हुए, जबकि लोक नृत्य सामाजिक उत्सवों, बुवाई-कटाई, विवाह और जनजातीय विजय अभियानों के सामूहिक उल्लास का प्रतीक हैं।
  • वेशभूषा एवं संगीत: लोक नृत्यों में स्थानीय पारंपरिक परिधान, प्राकृतिक आभूषण तथा क्षेत्रीय वाद्ययंत्रों (जैसे ढोल, मांदर, झांझ, अलगोजा) का प्रयोग प्रमुखता से होता है।

यूनेस्को (UNESCO) अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर में शामिल भारतीय लोक परंपराएँ

यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage - ICH) सूची में भारत के कई नृत्य रूपों और उत्सव-नाट्यों को शामिल किया गया है:

  • गरबा (गुजरात): दिसंबर 2023 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में भारत की 15वीं धरोहर के रूप में शामिल किया गया। यह शक्ति-उपासना और सामाजिक समानता का वैश्विक प्रतीक है।
  • कालबेलिया (राजस्थान): 2010 में शामिल। यह कालबेलिया सपेरा समुदाय की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सर्पाकार गति का अद्भुत नृत्य है।
  • छऊ नृत्य (झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल): 2010 में शामिल। यह मार्शल आर्ट और पारंपरिक युद्धकला पर आधारित मुखौटा नृत्य है।
  • मुदियेट्टू (केरल): 2010 में शामिल। देवी काली और दारिक असुर के युद्ध पर आधारित केरल का अनुष्ठानिक रंगमंच और नृत्य है।
  • लद्दाख का बौद्ध पाठ व संकीर्तन (मणिपुर): क्रमशः 2012 और 2013 में इस सूची में जोड़े गए।

भारत के लोक नृत्यों की राज्य-वार विस्तृत सूची

नीचे दी गई तालिका में भारत के सभी प्रमुख राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोक नृत्यों का संकलन दिया गया है:

राज्य / केंद्रशासित प्रदेशप्रमुख लोक नृत्यविशिष्ट तथ्य / संबंधित जनजाति
राजस्थानघूमर, कालबेलिया, भवाई, तेरहताली, चरी, कच्छी घोड़ी, गैरघूमर भील जनजाति द्वारा प्रारंभ हुआ; भवाई सिर पर कई मटके रखकर संतुलन बनाने का नृत्य है; तेरहताली कामड़ पंथ की महिलाओं द्वारा रामदेव जी की आराधना में मंजीरों के साथ किया जाता है।
गुजरातगरबा, डांडिया रास, टिप्पणी, भवाई, पधारगरबा गर्भदीप (छिद्रित मिट्टी के घड़े में जलता दीपक) के इर्द-गिर्द होता है; टिप्पणी सौराष्ट्र की महिला मजदूरों द्वारा जमीन कूटते समय किया जाता था।
पंजाबभांगड़ा, गिद्दा, सम्मी, किकली, झुमरभांगड़ा पुरुषों द्वारा बैसाखी की फसल कटाई पर; गिद्दा महिलाओं द्वारा बोलियों के साथ; किकली युवतियों द्वारा हाथों की कैंची बनाकर गोल घूमने का नृत्य है।
हरियाणाफाग, लूर, धमाल, गूगा, खोरिया, डफलूर नृत्य केवल महिलाओं द्वारा फाल्गुन मास में किया जाता है; धमाल महाभारत काल से चला आ रहा प्राचीन नृत्य माना जाता है।
उत्तर प्रदेशचरकुला, रासलीला, नौटंकी, कजरी, झोरा, जैताचरकुला ब्रज क्षेत्र में 108 दीपकों का पिंजरा सिर पर रखकर किया जाता है; कजरी वर्षा ऋतु और विरह का लोक नृत्य-गीत है।
बिहारजट-जटिन, बिदेसिया, झिझिया, डोमकच, सोहर-खिलौनाजट-जटिन सूखे और मानसून के समय वैवाहिक जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है; बिदेसिया भिखारी ठाकुर की रचनाओं पर आधारित प्रवासन-वेदना का नाट्य है।
झारखंडछऊ (सरायकेला), पाइका, करमा, डोमकच, झुमइरपाइका एक मार्शल नृत्य है जिसमें सैनिक वेशभूषा में ढाल-तलवार के साथ नर्तक युद्ध कौशल दिखाते हैं।
पश्चिम बंगालपुरुलिया छऊ, बाउल, गंभीरा, ब्रिटा, टुसूपुरुलिया छऊ में नर्तक विशालकाय मिट्टी-कागज के मुखौटे पहनते हैं; गंभीरा में सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य किया जाता है।
ओडिशामयूरभंज छऊ, गोटीपुआ, घुमुरा, रणपा, दलखाईमयूरभंज छऊ बिना मुखौटे के किया जाता है; गोटीपुआ युवा लड़कों द्वारा स्त्री वेश में किया जाने वाला नृत्य है जो ओडिसी का आधार बना।
मध्य प्रदेशमटकी, जवारा, सैला, भगोरिया, मांच, अड़ा-खड़ामटकी मालवा का एकल नृत्य है जो ढोल की थाप पर होता है; जवारा बुंदेलखंड का नव-शस्य (फसल) नृत्य है; भगोरिया भील जनजाति का प्रणय नृत्य है।
छत्तीसगढ़पंथ पंथी, राउत नाचा, पंडवानी, गौर माड़िया, करमापंथ पंथी सतनामी समुदाय का जैतखाम के चारों ओर किया जाने वाला नृत्य है; राउत नाचा यादव समुदाय द्वारा दीवाली पर किया जाता है; गौर माड़िया में बाइसन के सींगों का मुकुट पहना जाता है।
असमबिहू, बागुरुम्बा, भोरताल, झूमुर, अली-आई-लिगांगबिहू वर्ष में तीन बार (रोंगाली, कोंगाली, भोगाली) मनाया जाता है; बागुरुम्बा बोडो जनजाति का तितलीनुमा नृत्य है; झूमुर चाय बागान मजदूरों का नृत्य है।
अरुणाचल प्रदेशपोनुंग, मुखौटा नृत्य (छाम), वांचो, टापूपोनुंग आदि जनजाति की महिलाओं द्वारा फसल उत्सव पर किया जाता है; टापू युद्ध नृत्य है।
मेघालयनोंगक्रेम, शाद सुक मिनसीम, वांगला (100 ड्रम नृत्य)वांगला गारो जनजाति का सूर्य देवता सालजोंग को समर्पित फसल कटाई उत्सव नृत्य है।
मिजोरमचेराव (बांस नृत्य), खुआल्लम, छैहलामचेराव में जमीन पर बांस की नलियों को तालबद्ध पटका जाता है और नर्तक उनके बीच कूदते हुए कदम मिलाते हैं।
नागालैंडचांग लो (सुआ लुआ), जेलियांग, मोदसे, तितली नृत्यचांग लो चांग नागाओं द्वारा शत्रु पर विजय उत्सव के रूप में पारंपरिक पोषाक में किया जाता है।
मणिपुरथांग-टा, पुंग चोलोम, नूपा पाला, लाई हरोबाथांग-टा तलवार और भाले का मार्शल आर्ट नृत्य है; पुंग चोलोम में नर्तक स्वयं मृदंग (पुंग) बजाते हुए कलाबाजी दिखाते हैं।
त्रिपुराहोजागिरी, गरिया, लेबांग बुमानीहोजागिरी रियांग जनजाति की युवतियों द्वारा कलश और दीपक पर संतुलन बनाकर किया जाता है।
सिक्किमसिंघी छाम, याक छाम, चू-फाट, मारुनीसिंघी छाम कंचनजंघा पर्वत के बर्फानी शेर को समर्पित धार्मिक मुखौटा नृत्य है।
उत्तराखंडछोलिया, झोरा, छपेली, पांडव नृत्यछोलिया कुमाऊं का युद्ध-नृत्य (Martial Dance) है जो तलवार-ढाल के साथ बारात में किया जाता है।
हिमाचल प्रदेशनाटी, डांगी, झांझर, छरही, कयांगकुल्लू नाटी को विशालकाय भागीदारी के लिए गिनीज बुक/लिम्का बुक में दर्ज किया गया है।
जम्मू और कश्मीररऊफ, हिकात, कुद, दमहल, भांड पाथेररऊफ ईद और बसंत में कतारबद्ध महिलाओं द्वारा आमने-सामने झूलते हुए किया जाता है; दमहल वातल जनजाति के पुरुष झंडा गाड़कर करते हैं।
लद्दाखशोंडोल नृत्य, जबरो, ड्रुकपा छेचूशोंडोल को ‘शाही लद्दाखी नृत्य’ कहा जाता है, जिसने सबसे बड़े लद्दाखी नृत्य प्रदर्शन का रिकॉर्ड बनाया है।
महाराष्ट्रलावणी, धनगरी गजा, कोली, लेजिम, गोंधललावणी ढोलकी की थाप पर नौ गज की साड़ी (नौवारी) पहनकर किया जाने वाला द्रुत गति का नृत्य है।
गोवाफुगड़ी, धालो, देखनी, तरंगमेल, कुनबीफुगड़ी गणेश चतुर्थी पर महिलाओं द्वारा वृत्ताकार गति में फू-फू ध्वनि निकालते हुए किया जाता है।
कर्नाटकयक्षगान, डोलू कुनिथा, वीरगासे, बोलाक-आतडोलू कुनिथा कुरुबा समुदाय का विशाल नगाड़ों (डोलू) के साथ किया जाने वाला ऊर्जावान नृत्य है; यक्षगान तटीय कर्नाटक का अर्ध-शास्त्रीय नृत्य-नाट्य है।
केरलथेय्यम, ओट्टमथुल्लाल, पदयानी, कोल्कली, कैकोट्टिकलीथेय्यम उत्तर केरल का अनुष्ठानिक नृत्य है जिसमें नर्तक को साक्षात देवता का अवतार माना जाता है; ओट्टमथुल्लाल कुंचन नंबियार द्वारा रचित हास्य-व्यंग्य नृत्य है।
तमिलनाडुकरगट्टम, मयिलाट्टम, कावड़ी आट्टम, कुम्मी, ओयिलाट्टमकरगट्टम में नर्तक सिर पर जल कलश रखकर वर्षा देवी मरियम्मन की आराधना करते हैं; कावड़ी भगवान मुरुगन को समर्पित है।
आंध्र प्रदेश एवं तेलंगानाधमसा, लम्बाडी, विलासिनी नाट्यम, पेरिनि शिवतांडवमधमसा अराकू घाटी की वाल्मीकि जनजातियों का नृत्य है; पेरिनि शिवतांडवम काकतीय राजवंश के काल में सैनिकों में युद्ध-उत्साह भरने के लिए शुरू हुआ था।

लोक नृत्य याद रखने की स्मार्ट ट्रिक्स एवं तकनीकें

सैकड़ों नृत्यों को बिना भ्रमित हुए याद रखने के लिए निम्नलिखित वर्गीकृत रणनीतियों का उपयोग करें:

  1. मार्शल आर्ट / युद्ध आधारित नृत्यों का क्लस्टर: छोलिया (उत्तराखंड), पाइका (झारखंड/ओडिशा), थांग-टा (मणिपुर), छऊ (पूर्वी भारत), पेरिनि (तेलंगाना)। इन सभी में तलवार, ढाल या लाठी का प्रयोग होता है।
  2. संतुलन (Balancing) वाले नृत्यों का समूह: भवाई (राजस्थान - सिर पर 7 से 9 पीतल/मिट्टी के घड़े), चरकुला (उत्तर प्रदेश - 108 जलते दीपकों का पिंजरा), होजागिरी (त्रिपुरा - मिट्टी के घड़े पर खड़े होकर बोतल पर दीया संभालना), करगट्टम (तमिलनाडु - सिर पर पीतल का करगम)।
  3. बांस और छड़ी वाले नृत्यों का समूह: चेराव (मिजोरम - बांस नृत्य), टिप्पणी (गुजरात - लकड़ी की डंडी से फर्श कूटते हुए), डांडिया (गुजरात), कोलाट्टम (दक्षिण भारत)।
  4. पशु-पक्षी रूपक नृत्य: कालबेलिया (राजस्थान - नागिन चाल), मयिलाट्टम (तमिलनाडु - मोर नृत्य), सिंघी छाम (सिक्किम - हिम सिंह), गौर माड़िया (छत्तीसगढ़ - जंगली भैंसे के सींग)।

प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पूछे जाने का ट्रेंड (PYQ Insights)

विगत 5-10 वर्षों के UPSC (प्रारंभिक), SSC CGL, CHSL, BPSC और राज्य PCS के प्रश्न-पत्रों का विश्लेषण करने पर निम्नलिखित 4 प्रमुख पैटर्न उभर कर आते हैं:

  • सीधे मिलान (Matching Type): SSC और रेलवे में अक्सर सूची-I (नृत्य) और सूची-II (राज्य) को मिलाने वाले प्रश्न आते हैं (उदा. चेराव - मिजोरम, रऊफ - कश्मीर, बिहू - असम)।
  • संबद्ध जनजाति और समुदाय: UPSC एवं राज्य PCS में सीधे राज्य न पूछकर समुदाय पूछा जाता है। जैसे—‘बहादुर चेराव नृत्य किस राज्य से संबंधित है?’, ‘बागुरुम्बा नृत्य किस जनजाति द्वारा किया जाता है?’ (उत्तर: बोडो), ‘पंथ पंथी किस संप्रदाय से जुड़ा है?’ (उत्तर: सतनामी)।
  • अवसर और वाद्ययंत्र: फसल कटाई के नृत्य (वांगला, बिहू, जवारा) तथा विशिष्ट वाद्ययंत्र (पुंग चोलोम में ‘पुंग’, लावणी में ‘ढोलकी’, कालबेलिया में ‘पुंगी/बीन’) पर विस्तृत प्रश्न बनते हैं।
  • करेंट-स्टैटिक लिंकेज: जब किसी कला रूप को यूनेस्को या राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है (जैसे गरबा का यूनेस्को अमूर्त धरोहर बनना), तो आयोग उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (गर्भदीप का प्रतीकवाद) पर प्रश्न फ्रेम करता है।
महत्वपूर्ण परीक्षा टिप: छऊ नृत्य की तीन अलग-अलग शैलियाँ हैं और तीनों के राज्य भिन्न हैं—सरायकेला छऊ (झारखंड), मयूरभंज छऊ (ओडिशा), तथा पुरुलिया छऊ (पश्चिम बंगाल)। मयूरभंज छऊ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें नर्तक मुखौटा नहीं पहनते, जबकि सरायकेला और पुरुलिया में मुखौटा अनिवार्य है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

नवीनतम यूनेस्को अमूर्त धरोहर नृत्यगरबा (गुजरात, 2023)
कालबेलिया यूनेस्को में शामिल वर्ष2010
100 ड्रम्स नृत्य के रूप में प्रसिद्धवांगला (मेघालय)
बिना मुखौटे वाला छऊ नृत्यमयूरभंज छऊ (ओडिशा)
ब्रज का प्रसिद्ध दीपक संतुलन नृत्यचरकुला (उत्तर प्रदेश)
मिजोरम का पारंपरिक बांस नृत्यचेराव नृत्य
सतनामी समुदाय का प्रसिद्ध नृत्यपंथी नृत्य (छत्तीसगढ़)

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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Q1 दिसंबर 2023 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (ICH) सूची में भारत के किस लोक नृत्य को 15वें तत्व के रूप में शामिल किया गया?

Q2 छऊ नृत्य की निम्नलिखित में से कौन सी शैली बिना मुखौटा (Mask) पहने प्रदर्शित की जाती है?

Q3 ‘चेराव’ (Cheraw) लोक नृत्य, जिसमें जमीन पर रखे बांसों की ताल पर नर्तक कदम मिलाते हैं, किस राज्य से संबंधित है?

Q4 सिर पर 108 दीपकों से युक्त चरकुला (लकड़ी का पिंजरा) रखकर किया जाने वाला ‘चरकुला नृत्य’ मुख्य रूप से किस क्षेत्र से संबंधित है?

Q5 मेघालय की गारो जनजाति द्वारा सूर्य देवता सालजोंग की आराधना और फसल कटाई के उपलक्ष्य में कौन सा नृत्य किया जाता है?

स्रोत