आरबीआई के कड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव नियम और बैंकों की ऋण-जमा दर रिपोर्ट
आरबीआई ने रुपये में सट्टेबाजी रोकने के लिए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सीमा घटाई और वाणिज्यिक बैंकों की ऋण व सावधि जमा दरों के नवीनतम आंकड़े जारी किए।
⭐ मुख्य बिंदु
- आरबीआई ने बिना अंतर्निहित जोखिम के विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव की सीमा $100 मिलियन से घटाकर $5 मिलियन कर दी है।
- रद्द किए गए रुपया डेरिवेटिव अनुबंधों की पुनः बुकिंग पर पूर्ण पाबंदी लगाई गई है।
- $2 मिलियन से अधिक के वर्तमान खाता अनुबंधों पर 20% नकद विदेशी मुद्रा जोखिम आरक्षित निधि (FERR) अनिवार्य की गई।
- आरबीआई ने अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ऋण और जमा दरों की नवीनतम रिपोर्ट जारी की।
- नए और बकाया रुपया ऋणों पर भारित औसत उधारी दर (WALR) में मौद्रिक संचरण स्थिर बना हुआ है।
- बैंकों ने जमा जुटाने के लिए सावधि जमा दरों (WADTDR) में मामूली वृद्धि की है।
- अक्टूबर 2019 से सभी नए फ्लोटिंग रेट व्यक्तिगत और एमएसएमई ऋण बाह्य बेंचमार्क (EBLR) से जुड़े हैं।
विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव पर आरबीआई का कड़ा रुख: सट्टेबाजी पर लगाम
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अस्थिरता को नियंत्रित करने और रुपये की विनिमय दर में अवांछित उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव (Forex Derivatives) के नियमों में बड़ा फेरबदल किया है। केंद्रीय बैंक ने बिना अंतर्निहित जोखिम (Underlying Exposure) के मुद्रा डेरिवेटिव पोजीशन लेने की सीमा को भारी कटौती करते हुए 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से घटाकर मात्र 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर कर दिया है। इसके साथ ही, रद्द किए गए रुपया डेरिवेटिव अनुबंधों की पुनः बुकिंग (Rebooking) पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
क्या हुआ?
आरबीआई द्वारा जारी नए विनियामक निर्देशों के अनुसार, चालू खाते से संबंधित विदेशी मुद्रा खरीद के 2 मिलियन डॉलर से अधिक के हेजिंग अनुबंधों पर अधिकृत डीलरों (Authorised Dealers) के लिए 20% नकद विदेशी मुद्रा जोखिम आरक्षित निधि (Foreign Exchange Risk Reserve - FERR) बनाए रखना अनिवार्य किया गया है। यह कदम बाजार में कृत्रिम तरलता और सट्टेबाजी की प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
पृष्ठभूमि व विनियामक आधार
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) के तहत रिज़र्व बैंक को बाह्य व्यापार को सुगम बनाने और देश में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास एवं रखरखाव का दायित्व सौंपा गया है। हाल के वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और प्रमुख मुद्राओं के उतार-चढ़ाव के बीच रुपये के अवमूल्यन के दबाव को कम करने तथा कॉरपोरेट्स द्वारा वास्तविक व्यावसायिक आवश्यकताओं के लिए ही डेरिवेटिव साधनों का उपयोग सुनिश्चित करने हेतु यह कड़ा कदम उठाया गया है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण
- FEMA 1999: इसने 1 जून 2000 से फेरा (FERA, 1973) का स्थान लिया था, जो नागरिक कानून (Civil Law) की श्रेणी में आता है।
- करेंसी डेरिवेटिव्स: ये वित्तीय अनुबंध हैं जिनका मूल्य दो या दो से अधिक मुद्राओं के बीच विनिमय दर पर निर्भर करता है (जैसे- फ्यूचर्स, ऑप्शंस, फॉरवर्ड और करेंसी स्वैप)।
- FERR का प्रभाव: अधिक मार्जिन और पूंजीगत आवश्यकताओं के चलते बाजार में गैर-जरूरी हेजिंग और आर्बिट्राज गतिविधियों में कमी आएगी।
अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की ऋण व जमा दरों की समीक्षा (Lending & Deposit Rates)
भारतीय रिजर्व बैंक ने अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) की ऋण और जमा दरों से संबंधित नवीनतम आंकड़े जारी किए हैं। यह रिपोर्ट नीतिगत रेपो दर के संचरण (Monetary Transmission) और बैंकिंग प्रणाली में तरलता की वास्तविक स्थिति का आकलन प्रस्तुत करती है।
ताज़ा आंकड़े और रुझान
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बैंकों के नए स्वीकृत रुपया ऋणों (Fresh Rupee Loans) पर भारित औसत उधारी दर (WALR) तथा बकाया ऋणों (Outstanding Loans) की दरों में स्थिरता देखी गई है। वहीं दूसरी ओर, बैंकों द्वारा जमा आकर्षित करने के लिए घरेलू सावधि जमाओं पर भारित औसत सावधि जमा दर (WADTDR) में प्रतिस्पर्धात्मक वृद्धि दर्ज की गई है।
| संकेतक (Indicator) | प्रवृत्ति / स्थिति | महत्व |
|---|---|---|
| नवीनतम स्वीकृत ऋण दर (WALR - Fresh) | संतुलित व स्थिर | निवेशकों और उधारकर्ताओं के लिए पूंजी लागत का निर्धारण |
| बकाया ऋण दर (WALR - Outstanding) | मजबूत संचरण | पुरानी देनदारियों पर ब्याज भार की स्थिति |
| सावधि जमा दर (WADTDR) | हल्की बढ़ोतरी | बचतकर्ताओं के लिए वास्तविक प्रतिफल में सुधार |
मौद्रिक नीति संचरण का महत्व
मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा निर्धारित रेपो दर का प्रभाव जब वाणिज्यिक बैंकों की वास्तविक उधारी व जमा दरों तक पहुंचता है, तो उसे मौद्रिक संचरण (Monetary Transmission) कहा जाता है। अक्टूबर 2019 से आरबीआई ने खुदरा और एमएसएमई ऋणों के लिए बाह्य बेंचमार्क आधारित उधारी दर (EBLR) को अनिवार्य किया था, जिससे नीतिगत दरों में बदलाव का असर सीधे ग्राहकों तक तेजी से पहुंचता है।
डिजिटल भुगतान विस्तार और मुद्रा मांग का अध्ययन
आरबीआई के हालिया आर्थिक विश्लेषण में यह भी रेखांकित किया गया है कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के तीव्र प्रसार ने अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष नकदी की मांग (Cash Demand) को पुनर्गठित किया है। कार्यबल के औपचारिकीकरण और उच्च वित्तीय साक्षरता वाले राज्यों में नकदी पर निर्भरता में तेज गिरावट दर्ज की गई है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में औपचारिक बचत का प्रवाह बढ़ा है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| नियामक संस्था | भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) |
|---|---|
| विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव नई सीमा | 5 मिलियन अमेरिकी डॉलर |
| FERR आरक्षित अनुपात | 20% नकद मार्जिन |
| EBLR व्यवस्था की शुरुआत | 1 अक्टूबर 2019 |
| विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) | वर्ष 1999 (प्रभावी 2000) |
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
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Q1 भारतीय रिजर्व बैंक ने बिना अंतर्निहित जोखिम (Without Underlying Exposure) के मुद्रा डेरिवेटिव पोजीशन की सीमा को घटाकर कितना कर दिया है?
Q2 आरबीआई द्वारा अधिकृत डीलरों के लिए लागू किए गए 'FERR' का पूर्ण रूप क्या है?
Q3 भारत में वाणिज्यिक बैंकों के लिए बाह्य बेंचमार्क आधारित उधारी दर (EBLR) प्रणाली किस वर्ष से अनिवार्य की गई थी?
Q4 विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) ने किस पुराने अधिनियम का स्थान लिया था?
Q5 अर्थशास्त्र में 'भारित औसत उधारी दर' (WALR) मुख्य रूप से क्या दर्शाती है?







