विज्ञान एवं तकनीक

नाविक प्रणाली की बहाली हेतु इसरो का NVS-03 मिशन और भारत में खोजे गए मंगल समरूप स्थल

इसरो 30 अक्टूबर को नेविगेशन उपग्रह NVS-03 लॉन्च करने जा रहा है, वहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु में मंगल समरूप स्थलों की पहचान की है।

⭐ मुख्य बिंदु

  • इसरो 30 अक्टूबर 2026 को जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट द्वारा नेविगेशन उपग्रह NVS-03 का प्रक्षेपण करेगा।
  • NVS-03 नाविक तारामंडल में न्यूनतम चार परिचालन उपग्रहों की अनिवार्यता पूरी कर स्वतंत्र 3D पोजिशनिंग सेवा बहाल करेगा।
  • इस उपग्रह में स्पेस एप्लिकेशन सेंटर द्वारा विकसित स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी और नागरिक अनुकूल L1 बैंड शामिल है।
  • केरल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु के नेवेली और तिरुचिरापल्ली में मंगल समरूप स्थलों की खोज की है।
  • नेवेली में मेलेंटेराइट और तिरुचिरापल्ली में जिप्सम खनिज पाए गए जो मंगल के प्राचीन जलीय वातावरण के समान हैं।
  • डीसीजीआई ने उन्नत ग्रासनली (एसोफैगल) कैंसर के इलाज हेतु पीडी-1 इनहिबिटर दवा टोरीपॉलीमैब को मंजूरी दी है।
  • टोरीपॉलीमैब ने क्लिनिकल ट्रायल में बीमारी के प्रसार और मृत्यु जोखिम में 42% की कमी दर्ज की है।

भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हाल ही में दो अत्यंत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियां सामने आई हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपनी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली ‘नाविक’ (NavIC) की स्वतंत्र स्थिति निर्धारण क्षमता को पुनर्स्थापित करने के लिए दूसरी पीढ़ी के उपग्रह NVS-03 के प्रक्षेपण की अंतिम तैयारी में है। वहीं, केरल विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिकों ने भारत में पहली बार मंगल ग्रह के भूवैज्ञानिक इतिहास और जीवन की संभावनाओं को समझने के लिए तमिलनाडु के नेवेली और तिरुचिरापल्ली में ‘मंगल समरूप स्थलों’ (Martian Analogue Sites) की पहचान की है। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य अनुसंधान क्षेत्र में औषधि महानियंत्रक (DCGI) ने उन्नत ग्रासनली (एसोफैगल) कैंसर के विरुद्ध एक नई लक्षित इम्यूनोथेरेपी दवा ‘टोरीपॉलीमैब’ (Zytorvi) को मंजूरी दी है।

1. इसरो का NVS-03 मिशन: स्वदेशी नाविक प्रणाली को मिलेगी नई ऊर्जा

क्या हुआ?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 30 अक्टूबर 2026 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपने भारी प्रक्षेपण यान GSLV Mk II (GSLV-F18) के माध्यम से लगभग 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 उपग्रह का प्रक्षेपण करने जा रहा है। यह उपग्रह भारत की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन श्रृंखला (Navigation Satellite Series) का तीसरा उपग्रह है, जिसे भू-तुल्यकालिक कक्षा (Geosynchronous Orbit) में 32.5 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थापित किया जाएगा।

पृष्ठभूमि व तकनीकी संकट

भारत ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सटीक जीपीएस डेटा की अनुपलब्धता के सबक के बाद अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम), जिसे वर्तमान में NavIC (Navigation with Indian Constellation) कहा जाता है, की योजना बनाई थी। इस प्रणाली को भारत और उसकी सीमाओं के लगभग 1,500 किलोमीटर के दायरे में सटीक स्थिति निर्धारण, नौवहन और समय (PNT) सेवाएँ प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

हालांकि, हाल के वर्षों में पहली पीढ़ी के उपग्रहों की जीवन अवधि समाप्त होने और यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं से आयातित रूबिडियम परमाणु घड़ियों (Rubidium Atomic Clocks) में खराबी आने के कारण नाविक प्रणाली की कार्यक्षमता प्रभावित हुई। इसके अलावा, NVS-02 उपग्रह के प्रणोदन तंत्र (Propulsion System) में विसंगति आने से वह अपनी लक्षित कक्षा तक पूरी तरह नहीं पहुंच सका था। इसके चलते नाविक तारामंडल में सक्रिय उपग्रहों की संख्या घटकर मात्र 3 रह गई थी। किसी भी नेविगेशन प्रणाली द्वारा उपयोगकर्ता को त्रि-आयामी स्थिति (अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई) तथा सटीक समय उपलब्ध कराने के लिए न्यूनतम 4 परिचालन उपग्रहों के सिग्नलों की आवश्यकता होती है। NVS-03 का सफल प्रक्षेपण नाविक की इस न्यूनतम आवश्यकता को पूरा कर स्वतंत्र स्टैंडअलोन जीपीएस सेवाओं को पूरी तरह बहाल कर देगा।

NVS-03 की तकनीकी विशेषताएं

  • स्वदेशी परमाणु घड़ियां: NVS-03 में अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा विकसित अत्यधिक सटीक और अंतरिक्ष-योग्य स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी लगाई गई है, जिससे विदेशी घटकों पर निर्भरता समाप्त हुई है।
  • ट्राई-बैंड सिग्नल सपोर्ट: यह उपग्रह पारंपरिक L5 और S बैंड के साथ-साथ अत्यंत महत्वपूर्ण L1 बैंड में भी सिग्नल प्रसारित करेगा। L1 बैंड नागरिक नेविगेशन का वैश्विक मानक है, जिससे भविष्य में सामान्य स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और IoT उपकरण सीधे नाविक प्रणाली से जुड़ सकेंगे।
  • 12 वर्षों का सेवाकाल: NVS-03 उपग्रह को न्यूनतम 12 वर्षों के सेवाकाल के लिए तैयार किया गया है, जो राष्ट्रीय रक्षा और नागरिक परिवहन दोनों को दीर्घकालिक सुरक्षा देगा।

2. तमिलनाडु में खोजे गए ‘मंगल समरूप स्थल’ (Martian Analogue Sites)

क्या हुआ?

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST-FIST) के सहयोग से केरल विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने तमिलनाडु के नेवेली (Neyveli) और तिरुचिरापल्ली बैडलैंड्स (Tiruchirappalli) तथा चिली के अटाकामा मरुस्थल में ऐसे विशिष्ट खनिजों की पहचान की है जो रासायनिक और भूवैज्ञानिक रूप से मंगल ग्रह की सतह के समान हैं। इस शोध को ग्रहीय विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: प्लैनेट्स’ में प्रकाशित किया गया है।

वैज्ञानिक महत्व व पृष्ठभूमि

अंतरिक्ष यानों द्वारा केवल कक्षीय (ऑर्बिटल) स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से मंगल ग्रह के खनिजों और जल-इतिहास को पूरी तरह समझना संभव नहीं होता। इसके लिए पृथ्वी पर स्थित ऐसे स्थलीय स्थलों (Terrestrial Analogues) की आवश्यकता होती है जो मंगल जैसी चरम स्थितियों और जल-चट्टान अंतःक्रियाओं को प्रदर्शित करते हों।

  • मेलेंटेराइट (Melanterite): शोधकर्ताओं ने लेजर रमन स्पेक्ट्रोमीटर की सहायता से नेवेली के लिग्नाइट संस्तरों में मार्कासाइट के ऑक्सीकरण से बने ‘मेलेंटेराइट’ की पहचान की। यह एक जलयुक्त सल्फेट है, जो मंगल ग्रह पर अतीत में मौजूद रहे अल्पकालिक अम्लीय, ऑक्सीकरणकारी और जलीय वातावरण का सटीक मॉडल प्रस्तुत करता है।
  • जिप्सम (Gypsum): तिरुचिरापल्ली के अर्ध-शुष्क भूभाग और अटाकामा मरुस्थल में जिप्सम की पहचान की गई। जिप्सम न केवल अतीत के जल प्रवाह का रिकॉर्ड रखता है, बल्कि अपने क्रिस्टलीय ढांचे के भीतर सूक्ष्मजीवियों के अवशेषों (Biosignatures) को लाखों वर्षों तक सुरक्षित रखने की क्षमता रखता है।
  • आगामी मिशनों को लाभ: इन खोजों से इसरो के आगामी मंगलयान-2 (Mangalyaan-2 / MOM-2) और लैंडर/रोवर मिशनों के वैज्ञानिक पेलोड को डिजाइन करने और संभावित लैंडिंग स्थलों के विश्लेषण में मदद मिलेगी।

3. उन्नत ग्रासनली कैंसर के लिए इम्यूनोथेरेपी दवा ‘टोरीपॉलीमैब’ को मंजूरी

क्या हुआ?

भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के तहत उन्नत, मेटास्टेटिक या अप्रत्यारोपणीय (Unresectable) एसोफैगल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (ESCC) से पीड़ित वयस्क मरीजों के लिए नई इम्यूनोथेरेपी दवा टोरीपॉलीमैब (ब्रांड नाम: Zytorvi) को सिस्प्लैटिन और पैक्लिटैक्सेल कीमोथेरेपी के संयोजन में प्रथम-पंक्ति (First-line) उपचार के रूप में मंजूरी प्रदान की है।

जैव-चिकित्सीय दृष्टिकोण एवं महत्व

ग्रासनली (Esophagus) का कैंसर भारत में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है, जो कुल कैंसर मौतों का लगभग 8% हिस्सा है। टोरीपॉलीमैब एक PD-1 (प्रोग्राम्ड सेल डेथ प्रोटीन-1) इनहिबिटर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी है। सामान्यतः कैंसर कोशिकाएं प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाओं को निष्क्रिय कर देती हैं; यह दवा PD-1 रिसेप्टर को अवरुद्ध करके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ट्यूमर कोशिकाओं पर सीधा हमला करने के लिए पुनः सक्रिय कर देती है।

फेज-3 ‘जुपिटर-06’ (JUPITER-06) क्लिनिकल ट्रायल के अनुसार, इस दवा ने केवल कीमोथेरेपी की तुलना में बीमारी के बढ़ने या मृत्यु के जोखिम को 42% तक कम कर दिया। सबसे खास बात यह है कि भारतीय नियामक ने इसके उपयोग के लिए पीडी-एल1 (PD-L1) बायोमार्कर परीक्षण की पूर्व-शर्त नहीं रखी है, जिससे सभी पात्र मरीजों को इस उन्नत इम्यूनोथेरेपी का त्वरित लाभ मिल सकेगा।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

विषय / तकनीकसंबंधित एजेंसी / शोधकर्तामुख्य तकनीकी तथ्य
NVS-03 उपग्रहISRO / SDSC SHARGSLV-F18 रॉकेट; L1, L5, S-बैंड; स्वदेशी रूबिडियम घड़ी; द्रव्यमान 2,232 किग्रा
NavIC तारामंडलइसरो (Space Applications Centre)क्षेत्रीय नेविगेशन (1,500 किमी विस्तार); स्वतंत्र 3D निर्धारण हेतु न्यूनतम 4 उपग्रह अनिवार्य
मार्शियन एनालॉग स्थलकेरल विश्वविद्यालय / DST-FISTनेवेली (मेलेंटेराइट) और तिरुचिरापल्ली (जिप्सम); मंगल के जल-इतिहास का अध्ययन
टोरीपॉलीमैब (Zytorvi)CDSCO / DCGI स्वीकृतिPD-1 इनहिबिटर इम्यूनोथेरेपी; एसोफैगल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (ESCC) का उपचार

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

उपग्रह का नाम एवं श्रेणीNVS-03 (नाविक की दूसरी पीढ़ी का तीसरा उपग्रह)
प्रक्षेपण यान एवं स्थलGSLV-F18, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (श्रीहरिकोटा)
स्वदेशी परमाणु घड़ी निर्माताअंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC), अहमदाबाद
स्वतंत्र नेविगेशन हेतु आवश्यक न्यूनतम उपग्रह4 परिचालन उपग्रह (3D स्थिति और समय हेतु)
नेवेली में पहचाना गया मंगल-समरूप खनिजमेलेंटेराइट (Melanterite - जलयुक्त सल्फेट)
टोरीपॉलीमैब की औषधि श्रेणीPD-1 इनहिबिटर (मोनोक्लोनल एंटीबॉडी इम्यूनोथेरेपी)

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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Q1 हाल ही में नाविक (NavIC) प्रणाली की स्थिति निर्धारण सेवाओं को पुनर्स्थापित करने के लिए इसरो द्वारा प्रक्षेपित किए जाने वाले ‘NVS-03’ उपग्रह में कौन-सा नया फ्रीक्वेंसी बैंड शामिल किया गया है, जो उपभोक्ता स्मार्टफोन के साथ संगत है?

Q2 उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली में किसी उपयोगकर्ता की सटीक त्रिविमीय स्थिति (अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई) तथा समय निर्धारित करने हेतु न्यूनतम कितने सक्रिय उपग्रहों की आवश्यकता होती है?

Q3 केरल विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिकों ने हाल ही में तमिलनाडु के किस स्थल पर ‘मेलेंटेराइट’ खनिज की खोज कर उसे ‘मंगल समरूप स्थल’ (Martian Analogue Site) के रूप में चिन्हित किया है?

Q4 केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO/DCGI) द्वारा हाल ही में स्वीकृत ‘टोरीपॉलीमैब’ (Zytorvi) दवा का संबंध किस गंभीर रोग के उपचार से है?

Q5 NVS श्रृंखला के उपग्रहों में प्रयुक्त स्वदेशी रूबिडियम परमाणु घड़ी (Rubidium Atomic Clock) का विकास इसरो के किस केंद्र द्वारा किया गया है?

स्रोत