6G संचार हेतु JNCASR का टेराहर्ट्ज़ चिप और इंडियाएआई के स्वदेशी मॉडल ‘EKA-1’ व ‘धीर’
भारत ने 6G वायरलेस तकनीक हेतु 100 Gbps टेराहर्ट्ज़ चिप विकसित की और संप्रभु AI के तहत स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल ‘EKA-1’ व ‘धीर’ पेश किए।
⭐ मुख्य बिंदु
- JNCASR के शोधकर्ताओं ने टोपोलॉजिकल फोटोनिक्स का उपयोग कर 100 Gbps की गति वाला टेराहर्ट्ज़ सिलिकॉन चिप विकसित किया।
- यह चिप फोटोनिक क्लेन टनलिंग सिद्धांत पर आधारित है, जिससे बाधाओं के बावजूद सिग्नल हानि केवल 1-2% रहती है।
- टेराहर्ट्ज़ आवृत्तियां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में माइक्रोवेव और इन्फ्रारेड तरंगों के मध्य स्थित होती हैं और 6G नेटवर्क की रीढ़ हैं।
- इंडियाएआई मिशन के तहत भारत ने EKA-1 (26.3B पैरामीटर्स) और धीर 2B व 5B स्वदेशी फाउंडेशन मॉडल लॉन्च किए।
- EKA-1 मॉडल संविधान की सभी 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में कोडिंग व तर्कशक्ति प्रदान करता है।
- ज़ेंटेक द्वारा विकसित ‘धीर’ मॉडल 100% ऑफलाइन कार्य करने में सक्षम है, जो रक्षा व संवेदनशील क्षेत्रों के लिए अनुकूल है।
- इसरो का ‘डीएफएसएम 2030’ मिशन वर्ष 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष अभियानों को मलबा-मुक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
- डीएफएसएम नीति के तहत LEO उपग्रहों का अवशिष्ट जीवनकाल 5 वर्ष निर्धारित है, जो IADC के 25 वर्ष के मानक से अधिक सख्त है।
भारत के वैज्ञानिक और तकनीकी परिदृश्य में हाल ही में महत्वपूर्ण सफलताएं दर्ज की गई हैं। संचार क्रांति के अगले चरण यानी 6G वायरलेस नेटवर्क की दिशा में देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थान ने टेराहर्ट्ज़ फ्रीक्वेंसी पर डेटा संचार में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। वहीं दूसरी ओर, संप्रभु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Sovereign AI) के राष्ट्रीय लक्ष्य को गति देते हुए इंडियाएआई मिशन के तहत देश के पहले बहुभाषी व ऑफलाइन-सक्षम फाउंडेशन मॉडल्स का अनावरण किया गया है। साथ ही, बाह्य अंतरिक्ष के सतत उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए इसरो के ‘डीएफएसएम 2030’ रोडमैप पर भी प्रगति जारी है।
6G तकनीक में बड़ी छलांग: JNCASR ने विकसित किया 100 Gbps टेराहर्ट्ज़ चिप
क्या हुआ?
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने एक अभिनव सिलिकॉन फोटोनिक चिप विकसित की है। यह चिप टोपोलॉजिकल फोटोनिक्स (Topological Photonics) का उपयोग करके अवरोधों के बावजूद टेराहर्ट्ज़ तरंगों को न्यूनतम सिग्नल हानि के साथ प्रसारित कर सकती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस चिप ने 100 गीगाबिट प्रति सेकंड (Gbps) तक की अभूतपूर्व डेटा स्थानांतरण गति हासिल की है।
तकनीकी विशेषताएं और पृष्ठभूमि
- ग्राफीन जैसी संरचना: वैज्ञानिकों ने सिलिकॉन स्लैब में त्रिकोणीय छेदों को ग्राफीन के हनीकॉम्ब लैटिस (honeycomb lattice) के समान पैटर्न में व्यवस्थित करके फोटोनिक क्रिस्टल तैयार किया। यह संरचना टेराहर्ट्ज़ तरंगों को बैकस्कैटरिंग (सिग्नल बिखरने) से बचाती है।
- फोटोनिक क्लेन टनलिंग: क्वांटम भौतिकी के ‘क्लेन टनलिंग’ प्रभाव पर आधारित यह तकनीक तरंगों को बाधाओं के आर-पार बिना ऊर्जा खोए निकलने देती है। पारंपरिक वेवगाइड्स की तुलना में इस चिप में एक बाधा से केवल 1-2% और दो बाधाओं से मात्र 2-3% सिग्नल लॉस हुआ।
- पारंपरिक सेमीकंडक्टर निर्माण के अनुकूल: यह चिप हाई-रेसिस्टिविटी सिलिकॉन पर निर्मित की गई है, जिससे इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन मौजूदा सेमीकंडक्टर फैब में संभव है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- स्पेक्ट्रम स्थिति: टेराहर्ट्ज़ (THz) आवृत्तियां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में माइक्रोवेव और इन्फ्रारेड तरंगों के मध्य (0.1 THz से 10 THz) स्थित होती हैं, जो अत्यधिक उच्च बैंडविड्थ और शून्य-विलंबता (ultra-low latency) प्रदान करती हैं।
- 6G में भूमिका: 6G वायरलेस नेटवर्क के कॉम्पैक्ट और ऊर्जा-कुशल माइक्रोचिप्स के निर्माण में यह तकनीक आधारशिला सिद्ध होगी।
संप्रभु AI की दिशा में मील का पत्थर: इंडियाएआई मिशन के तहत ‘EKA-1’ और ‘धीर’ का लोकार्पण
क्या हुआ?
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के इंडियाएआई मिशन (IndiaAI Mission) के तहत दो प्रमुख घरेलू नवाचारों को सार्वजनिक किया गया: सोकेट लैब्स द्वारा विकसित ‘EKA-1’ और ज़ेंटेक एआईटेक (ZenteiQ) द्वारा विकसित ‘धीर 2B’ व ‘धीर 5B’। ये मॉडल भारत के ‘इंडियाएआई इनोवेशन सेंटर’ स्तंभ के अंतर्गत तैयार किए गए हैं।
मॉडल्स की प्रमुख विशिष्टताएं
| विशेषता | EKA-1 | धीर (Dhīr 2B & 5B) |
|---|---|---|
| डेवलपर | सोकेट लैब्स (Soket Labs) | ज़ेंटेक एआईटेक इनोवेशन्स |
| पैरामीटर का आकार | 26.3 बिलियन (26.3B) | 2.03B और 5.09B |
| प्रशिक्षण डेटा | लगभग 7.5 ट्रिलियन टोकन | 6.2 ट्रिलियन टोकन (TPU v6e पर) |
| भाषाई समर्थन | सभी 22 अनुसूचित भारतीय भाषाएं + अंग्रेज़ी | अंग्रेज़ी + 10 प्रमुख भारतीय भाषाएं |
| तैनाती स्वरूप | क्लाउड और एंटरप्राइज़ सर्वर | 100% ऑफलाइन, एज डिवाइसेज पर सक्षम |
| प्रमुख अनुप्रयोग | गणित, कोडिंग, तर्क (Reasoning), BFSI | रक्षा, सुरक्षा-संवेदनशील संस्थाएं, सीमित कनेक्टिविटी |
रणनीतिक महत्व
विदेशी मॉडल्स पर डेटा निर्भरता घटाने और ‘संप्रभु एआई’ के निर्माण में यह कदम गेम-चेंजर है। विशेषकर ‘धीर’ मॉडल पूरी तरह इंटरनेट-मुक्त वातावरण में काम कर सकता है, जिससे संवेदनशील रक्षा और रणनीतिक प्रतिष्ठानों में डेटा रिसाव का जोखिम समाप्त हो जाता है। ये सभी मॉडल राष्ट्रीय डेटा रिपॉजिटरी ‘AIKosh’ के माध्यम से शोधकर्ताओं और डेवलपर्स के लिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
सतत अंतरिक्ष संचालन: इसरो का ‘डीएफएसएम 2030’ (Debris-Free Space Missions) विज़न
क्या हुआ व प्रमुख लक्ष्य
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने वर्ष 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष मिशनों को पूरी तरह से मलबा-मुक्त (Debris Free) बनाने के अपने डीएफएसएम 2030 (DFSM 2030) संकल्प को गति दी है। इसके तहत सरकारी और निजी (गैर-सरकारी) दोनों हितधारकों के लिए कड़े मानक तय किए गए हैं।
मानक एवं तकनीकी तंत्र
- 5-वर्षीय डिस्पोज़ल नियम: निम्न भू-कक्षा (LEO) उपग्रहों के लिए मिशन समाप्ति के बाद अवशिष्ट कक्षीय जीवनकाल (residual orbital lifetime) को अधिकतम 5 वर्ष तक सीमित किया गया है, जो वैश्विक अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (IADC) के 25-वर्षीय मानक से काफी अधिक सख्त है।
- 99% विश्वसनीयता: उपग्रहों और रॉकेट के ऊपरी चरणों को मिशन पूरा होने पर ‘डी-ऑर्बिट’ (वायुमंडल में पुनः प्रवेश कर जलाना) या ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में भेजने की 99% सफलता दर अनिवार्य की गई है।
- IS4OM व प्रोजेक्ट नेत्र: इसरो सिस्टम फॉर सेफ एंड सस्टेनेबल ऑपरेशंस मैनेजमेंट (IS4OM) और प्रोजेक्ट ‘नेत्रा’ (NETRA) के जरिए अंतरिक्ष मलबे और उपग्रहों के संभावित टकराव (Conjunction) की 24x7 वास्तविक समय पर निगरानी की जा रही है।
- केसलर सिंड्रोम की रोकथाम: मलबे के अनियंत्रित टकराव से उत्पन्न होने वाली संभावित शृंखला अभिक्रिया (Kessler Syndrome) को रोकने के लिए भारत ने कार्टोसैट-2 का नियंत्रित डी-ऑर्बिटिंग सफलतापूर्वक पूरा कर वैश्विक मिसाल पेश की है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
| JNCASR का मुख्यालय | बेंगलुरु, कर्नाटक |
|---|---|
| JNCASR की संबद्धता | विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार |
| EKA-1 मॉडल के पैरामीटर्स | 26.3 बिलियन (7.5 ट्रिलियन टोकन्स) |
| इंडियाएआई मॉडल रिपॉजिटरी पोर्टल | AIKosh |
| डीएफएसएम (DFSM) का पूर्ण रूप | Debris-Free Space Missions |
| DFSM के तहत LEO अवशिष्ट कक्षा मानक | 5 वर्ष से कम (Sub-5-year lifetime) |
| अंतरिक्ष मलबा निगरानी प्रणाली | IS4OM एवं प्रोजेक्ट नेत्र (NETRA) |
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
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Q1 हाल ही में JNCASR द्वारा विकसित 100 Gbps गति वाले सिलिकॉन चिप में किस भौतिक परिघटना का उपयोग टेराहर्ट्ज़ तरंगों के ट्रांसमिशन हेतु किया गया है?
Q2 इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम में टेराहर्ट्ज़ (THz) विकिरण किन दो तरंग क्षेत्रों के मध्य स्थित होता है?
Q3 इंडियाएआई मिशन के तहत हाल ही में जारी किए गए स्वदेशी मॉडल ‘धीर’ (Dhīr 2B & 5B) की सबसे प्रमुख रणनीतिक विशेषता क्या है?
Q4 सोकेट लैब्स द्वारा विकसित संप्रभु एआई मॉडल ‘EKA-1’ संविधान की कितनी अनुसूचित भाषाओं का समर्थन करता है?
Q5 इसरो के ‘डीएफएसएम 2030’ (Debris-Free Space Missions) के संदर्भ में निम्न भू-कक्षा (LEO) उपग्रहों के लिए अनुशंसित अधिकतम अवशिष्ट कक्षीय जीवनकाल कितना है?







