विज्ञान एवं तकनीक

आदित्य-L1 का सौर ज्वाला पर अभूतपूर्व अध्ययन और CSIR-DAKSHIN की विज्ञान साझेदारी

आदित्य-L1 के VELC पेलोड ने कोरोनल मास इजेक्शन के असममित विस्तार का खुलासा किया, वहीं CSIR और DAKSHIN ने ग्लोबल साउथ हेतु प्रौद्योगिकी सहयोग पर समझौता किया।

⭐ मुख्य बिंदु

  • आदित्य-L1 के मुख्य पेलोड VELC ने सौर ज्वालाओं (CME) के गैर-समान व असममित प्रसार का पहला 3D वैज्ञानिक प्रमाण दिया।
  • यह शोध DST के स्वायत्त संस्थान 'भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान' (IIA) द्वारा 'द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' में प्रकाशित किया गया।
  • VELC ने सौर कोरोना में अत्यधिक आयनित लोहे (Fe XIV) की 530.3 nm हरी वर्णक्रमीय रेखा के डॉपलर शिफ्ट का विश्लेषण किया।
  • सौर तूफानों के असममित विस्तार की सटीक समझ से उपग्रहों और पृथ्वी के पावर ग्रिडों की सुरक्षा हेतु अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान बेहतर होगा।
  • CSIR और DAKSHIN-RIS ने ग्लोबल साउथ के देशों में भारतीय नवाचारों व तकनीकी समाधानों को पहुँचाने हेतु साझेदारी पत्र पर हस्ताक्षर किए।
  • यह साझेदारी किफायती स्वास्थ्य देखभाल, जल शोधन और कृषि अवसंरचना जैसे सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को लक्षित करती है।
  • CSIR-NIScPR द्वारा पारंपरिक वैज्ञानिक ज्ञान के प्रमाणीकरण हेतु 'स्वास्तिक' (SVASTIK) के तीसरे खंड का विमोचन किया गया।

भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान और वैज्ञानिक कूटनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की गई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के प्रथम सौर वेधशाला मिशन ‘आदित्य-एल1’ (Aditya-L1) के प्राथमिक पेलोड द्वारा सौर ज्वालाओं के प्रसार को लेकर नया वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किया गया है। दूसरी ओर, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों में स्वदेशी व किफायती तकनीकों के प्रसार हेतु ‘दक्षिण’ (DAKSHIN-RIS) के साथ एक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए हैं।

1. आदित्य-L1 के VELC पेलोड की खोज: सौर ज्वालाओं का असममित विस्तार

क्या हुआ?

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने आदित्य-एल1 उपग्रह पर स्थापित विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) के डेटा का विश्लेषण कर कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के त्रि-आयामी (3D) व्यवहार को उजागर किया है। प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स’ (The Astrophysical Journal Letters) में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, सौर ज्वालाएँ पूर्व मान्यताओं के विपरीत एक समान सममित बुलबुले (Symmetric Bubble) के रूप में नहीं, बल्कि असममित और गैर-समान (Asymmetric and Non-uniform) गति से अंतरिक्ष में फैलती हैं।

वैज्ञानिक क्रियाविधि और तकनीक

  • डॉपलर स्पेक्ट्रोस्कोपी (Doppler Spectroscopy): VELC ने अत्यधिक आयनित लोहे के परमाणुओं (Fe XIV) से उत्सर्जित 530.3 नैनोमीटर की हरी उत्सर्जन रेखा का उपयोग कर सूर्य के बेहद निकटवर्ती कोरोना में प्लाज्मा के वेग को मापा।
  • द्विदिशीय गति की पहचान: स्पेक्ट्रम में एक साथ ब्लू-शिफ्ट (दृष्टि रेखा में दर्शक की ओर गति) और रेड-शिफ्ट (दर्शक से दूर गति) के स्पष्ट लक्षण दर्ज किए गए, जिससे प्लाज्मा के पार्श्व विस्तार (Lateral Expansion) का पता चला।
  • नासा के साथ संयुक्त डेटा: नासा के सोलर डायनामिक्स ऑब्जर्वेटरी (SDO) और IIA के 3D गतिज-ज्यामितीय मॉडल के समन्वय से सौर विस्फोट की सटीक आंतरिक संरचना तैयार की गई।

परीक्षा की दृष्टि से महत्व

पृथ्वी की ओर आने वाले सौर तूफानों की गति, प्रक्षेपवक्र और तीव्रता का सटीक पूर्वानुमान लगाना अब संभव होगा। इससे भू-चुंबकीय तूफानों (Geomagnetic Storms) से लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) उपग्रहों, जीपीएस नेविगेशन, संचार ग्रिड और पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क को समय पूर्व सुरक्षित किया जा सकेगा।

2. CSIR और DAKSHIN-RIS: ग्लोबल साउथ के लिए विज्ञान एवं नवाचार समझौता

क्या हुआ?

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) तथा विकासशील देशों के लिए अनुसंधान व सूचना प्रणाली के उत्कृष्टता केंद्र ‘दक्षिण’ (DAKSHIN – Global South Centre of Excellence at RIS) ने 3 नवंबर 2026 को एक सहयोग पत्र (Letter of Association) पर हस्ताक्षर किए हैं।

समझौते के प्रमुख उद्देश्य

  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer): CSIR द्वारा विकसित किफायती, टिकाऊ और स्थानीय रूप से अनुकूलनीय वैज्ञानिक तकनीकों को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के विकासशील देशों तक पहुँचाना।
  • प्राथमिक क्षेत्र: सस्ती स्वास्थ्य देखभाल (Affordable Healthcare & Diagnostics), टिकाऊ अवसंरचना (Sustainable Infrastructure), उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी और जल शोधन समाधान।
  • क्षमता निर्माण: वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का आदान-प्रदान, तकनीकी प्रशिक्षण और संयुक्त उद्यमों के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को गति देना।

परीक्षा की दृष्टि से महत्व

यह पहल भारत की ‘विज्ञान कूटनीति’ (Science Diplomacy) और ग्लोबल साउथ की आवाज बनने के रणनीतिक विज़न को मजबूती प्रदान करती है, जहाँ भारत केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि विकासशील विश्व के लिए समाधान प्रदाता बन रहा है।

3. पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक सत्यापन: SVASTIK और CDTK-2026

CSIR के राष्ट्रीय विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) ने नई दिल्ली में पारंपरिक ज्ञान के संचार पर तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (CDTK-2026) का आयोजन किया। इस दौरान ‘स्वास्तिक’ (SVASTIK – Scientifically Validated Traditional Knowledge) पहल के तीसरे संस्करण का विमोचन किया गया, जिसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों, पारंपरिक औषधियों और जल प्रबंधन प्रणालियों को आधुनिक प्रयोगशाला-परीक्षित वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है।

महत्वपूर्ण तुलना एवं तकनीकी अवलोकन

मिशन/पहलसंबद्ध संस्थाप्राथमिक उद्देश्य / तकनीकी विशेषता
Aditya-L1 (VELC)ISRO / IIA बेंगलुरुसौर कोरोना का 530.3 nm रेखा पर डॉपलर स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा 3D अध्ययन
CSIR-DAKSHIN LoACSIR और RISग्लोबल साउथ के देशों में किफायती स्वदेशी तकनीकों का निर्यात व हस्तांतरण
SVASTIKCSIR-NIScPRपारंपरिक भारतीय ज्ञान और वैज्ञानिक प्रथाओं का आधुनिक वैज्ञानिक सत्यापन

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

आदित्य-L1 का प्रक्षेपण2 सितंबर 2023 (PSLV-C57 रॉकेट द्वारा)
आदित्य-L1 की अवस्थितिसूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज बिंदु 1 (L1) के चारों ओर हेलो कक्षा (15 लाख किमी दूर)
VELC पेलोड निर्माताभारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु
CSIR की स्थापना26 सितंबर 1942 (अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री)
DAKSHIN पहलग्लोबल साउथ उत्कृष्टता केंद्र (RIS, नई दिल्ली के अधीन)
SVASTIK का पूर्ण रूपScientifically Validated Traditional Knowledge

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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Q1 हाल ही में चर्चा में रहे आदित्य-एल1 उपग्रह के प्राथमिक पेलोड 'विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ' (VELC) को किस संस्थान द्वारा विकसित किया गया है?

Q2 आदित्य-L1 के VELC पेलोड द्वारा सौर कोरोना में कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के अध्ययन हेतु किस वर्णक्रमीय उत्सर्जन रेखा (Spectral Line) का उपयोग किया जाता है?

Q3 ग्लोबल साउथ के विकासशील देशों में किफायती प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण और नवाचार को बढ़ावा देने हेतु नवंबर 2026 में CSIR ने किसके साथ साझेदारी की है?

Q4 अंतरिक्ष में लैग्रेंज बिंदु 1 (L1) के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

Q5 CSIR-NIScPR द्वारा संचालित 'स्वास्तिक' (SVASTIK) पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?

स्रोत